भारत पर विदेशी आक्रमण
पर्शियन (ईरानी ) आक्रमण :-
तत्कालीन राजनैतिक दशा :- ई0पू0 छठवीं सदी के लगभग आंतरिक
दृष्टि से जब भारत मगध के नेतृत्व में उभर रहा था। पश्चिमोत्तर भारत में छोटे -
छोटे राज्य स्वतंत्र अस्तित्व हेतु संघर्षषील थे। भारत के इसी पश्चिमोत्तर क्षेत्र
से विदेशी आक्रमण हुए।
एतिहासिक दृष्टि से भारत पर प्रथम आक्रमणकारी ‘‘ ईरानी
’’ ही थे।
भारत के पर्शिया से संबंध के बारे में एतिहासिक
मान्यता है कि आर्य, पर्शिया होते हुए भारत आए थे।
अतः ऋग्वेद काल में दोनों के बीच सम्पर्क था। परन्तु उत्तर वैदिक कालीन संबंधों का
वर्णन प्राप्त नहीं है। बौद्ध जातकों से ज्ञात होता है कि 700 ई0पू0 में इनके व्यावारिक संबंध थे।
कुरूष महान ( Cyrus The Great , 558 BC to 530 BC)
स्ट्रेबो का वर्णन :- कुरूष ने एक सेना भारत विजय के लक्ष्य से ‘‘ जेट्रोसिया ’’ से हो
कर भेजी थी। जो मार्ग की दुर्दान्त परेशानियों के कारण नष्ट हो गई। प्रारम्भिक
असफलता के उपरान्त कुरूष ने पुनः प्रयास किया।
एरियन :- अष्टक (Astanikois) तथा अष्वकों (Assakenois) जातियों ने कुरूष की अधीनता
स्वीकार कर ली।
प्लिनी :- कपिश नगर का विध्वंस हुआ।
दारा प्रथम (Darius First , 522 BC to 486
BC)
साइरस द्वितीय का उत्तराधिकारी या कुरूष जो ‘‘ हखामनी
वंश ’’ का संस्थापक था, का उत्तराधिकारी केम्बिसस (Cambyses) [ 530 BC to 522 BC]
को भारत की
ध्यान देने का अवसर ही नहीं मिला। किन्तु दारा प्रथम ने कुरूष के अध्याय को पूरा
करने का प्रयास किया।
बेहिस्तून, पर्सीपोलिस
तथा नक्ष - ए - रूस्तम अभिलेख :- दारा के इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसे
कुरूष से ज्यादा सफलता प्राप्त हुई है। बेहिस्तून का लेख गांधार को उसके अधीन
बताता हैं। परन्तु भारत का उल्लेख नहीं करता है। शेष दोनों अभिलेख ‘‘ सिंधु ’’ को
भी उसके अधीन बताते हैं।
हेरोडोट्स :- पंजाब को
डेरियस ने अपना बीसवां प्रान्त बनाया तथा स्काईलैक्स को एक जल बेड़े के साथ सिंधु
नदी में भेजा।
क्षर्यार्ष (Xerexes) [ 486
BC to 465 BC]
क्षर्याष ने भारतीय प्रदेशों को पैतृक रूप से प्राप्त
किया था। इसी समय गांधार का सैनिक बेड़ा पारसीकों की ओर से यूनान के खिलाफ लड़ा। डॉ0 मजूमदार इन्हें ‘‘ भाड़े के
सेनिक ’’ मानते हैं।
दारा तृतीय Darius
Third के समय तक
पर्षियन आधिपत्य लगभग 300 ई0पू0 तक बना रहा। यह मान्यता भ्रामक
है कि सिकन्दर ने डेरियस तृतीय को परास्त कर भारत पर से उसका डेरा कूच किया।
क्योंकि इस समय ( ई0पू0
327 ) यूनानी
सेना भारतीयों से ही लड़ी न कि पारसीक सेना से।
पारसीक हमले का भारत पर प्रभाव :-
भारतीय क्षेत्रों पर ईरानी अधिकार दो सौ वर्षों तक रहा
तथा राजनीतिक प्रभाव नगण्य था सिवाय इस बात के कि इनसे प्रेरित होकर भारत पर दूसरा
विदेशी हमला ग्रीक (यूनानी ) ने किया।
पारसीक संपर्क के कारण पश्चिमोत्तर भारत में खरोष्ठी
लिपि (दांए से बांए ) का जन्म हुआ, जो ईरानी लिपि अरमाइक की संतान
मानी जाती है।
अशोक ने इनसे प्रेरित हो कर ही शिक्षा लेखों की भारत
में स्थापना की।
राज्य को प्रान्तों में विभक्त करने की प्रेरणा
पारसीकों से प्राप्त हुई।
अंततः ईरानी प्रभाव राजनैतिक नहीं हो कर सांस्कृतिक
रहा जिसने सर्वाधिक प्रभावित मौर्य शासकों को किया।
भारत पर यूनानी आक्रमण
सिकंदर का आक्रमण :-
सिकंदर मैसौडानिया के क्षत्रप् फिलिप द्वितीय का पुत्र
था। तो विष्व विजय पर निकला था अतः उसे बहादुर सैनिकों की आवष्यकता थी। इसने
पारसीक राजा डेरियस प्रथम से बरबेला के युद्ध (327 ई0पू0)
लड़ा जिसमें
सिकंदर, भारतीय टुकड़ी की वीरता से मुग्ध
हो गया। अतः सिकंदर भारत पदाति दल की सेवा
प्राप्त करने के उद्देष्य से भारत अभियान पर निकल पड़ा। इस समय पष्चिमोत्तर भारत
में 28 प्रमुख राज्य थे। कर्टियस के
अनुसार तक्षशिला के शासक आम्भी ने सहायता का वचन देकर सिकंदर को पोरस के खिलाफ
आमंत्रित किया। आम्भी का अनुकरण ‘ शशिगुप्त ’ ने किया।
ई0पू0
327
को सिकन्दर ने ‘‘ खैबर दर्रा ’’ पार किया। तथा ‘ बैक्ट्रिया ’ पर आक्रमण के पूर्व
सामरिक महत्व की दृष्टि से ‘ अलैक्जेंड्रिया ’ नामक नगर की स्थापना की। तथा ‘
निकाह ’ नामक नगर में प्रवेष किया। यहीं पर आम्भी ने शशिगुप्त के साथ सिकन्दर से
भेंट की तथा सहायता का वचन दिया। एवं सिकंदर ने सेना को दो भागों में विभाजित कर
दिया। पहले भाग का नेतृत्व स्वयं ने किया तथा दूसरे भाग का नेतृत्व ‘ हेफेस्यिन ’
एवं ‘ पर्डियस ’ को सौंपा।
दूसरा भाग खैबर दर्रे से सिंध आया तथा सिंकंदर स्वयं
कुनार एवं स्वात नदी घाटी से हो कर आया।
सिंकंदर को कपिशा से तक्षशिला के मध्य बसी अनेक
जातियों से युद्ध लड़ना पड़ा।
अस्पिसिओई जाति से युद्ध :- सिकन्दर ने सर्वप्रथम
अलिसांगे तथा कुदार (कुनार) घाटी में निवास करने वाली अस्पिसिओई (अस्पिसियन) जाति
को परास्त कर उनके स्वस्थ तळा सुन्दर बैलों को छीन कर मकदूनिया भेज दिया। तत्पश्चात
सिकंदर ने ‘‘ बजौर की घाटी ’’ में प्रवेश किया। यहीं पर वो सेना के दूसरे भाग से
मिला।
कुछ सूत्रों के अनुसार यह मिलन ‘‘ पुष्कलावती ’’ में
बताते हैं।
नीसा (न्यासा) पर आक्रमण :‘- यहां के अभिजात वर्ग का
शासक ‘‘ अकुफिस ’’ ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अकुफिस से प्राप्त 300 घोड़े ले कर सिकंदर ने संभवतः
मेरोस पर्वत (कोहेमूर) की ओर प्रस्थान किया।
मस्सग पर आक्रमण :- यह नगर ‘‘ अस्सकेनोस ’’ (अश्वक) राज्य की राजधानी
था। जो गौरी नदी के पूर्व में स्वात नदी तट पर स्थित था। इस राज्य को ‘ सुवास्तू ’
तथा ‘उद्यान ’ नाम से भी जाना जाता है। काफी कड़े संघर्ष के उपरांत ही सिकंदर इसे
विजित कर सका। अस्सकेनस के मर जाने के बाद यहां की स्त्रियों ने सिकंदर से लोहा ले
कर शौर्यता का परिचय दिया। यहां के सैनिकों को अभयदान दे कर सिकंदर ने उन्हें धोखे
से मरवा डाला (इस घटना को सिकंदर पर लगा कलंक माना जाता है)।
पुष्कलावती :- सिकंदर ने सिंध के पष्चिम के समस्त भाग का क्षत्रप
निकानोर ¼NICANOR) को बनाया तथा यहां पर उसे सेना के दूसरे भाग द्वारा
पुष्कलावती विजय का समाचार प्राप्त हुआ। पुष्कलावती,
गांधार की
प्राचीन राजधानी थी। तथा सिंधु नदी को पार करने से पूर्व सिकंदर को आर्नो जाति से
संघर्ष करना पड़ा। पुष्कलावती विजय 30 दिन के कड़े संघर्ष के उपरांत
प्राप्त हुई।
आर्नो के दुर्ग पर आक्रमण :- यहां तक पहुंचना ‘ हरक्यूलिस
’ के वश से भी बाहर था। किन्तु ‘‘ टॉलेमी ’’ द्वारा प्रकाश स्तम्भ का निर्माण कर
देने से सिकंदर को अपनी सर्वश्रेष्ठ विजय प्राप्त हो गई। यवन लेखक इस विजय को
सिकंदर की भारत यात्रा का सबसे बड़ा सैनिक करिश्मा मानते हैं।
आम्भी का आत्मसमर्पण :- अटक से 16 मील ऊपर ओहिन्द पर पुल बना कर
सिकंदर ने सैनिकों को एक माह का विश्राम दिया। ओहिन्द का पुल सिंन्धु नदी पर बनाया
गया था। अब सिकंदर सिंधु नदी के पार था। यहां भारत के लिखित इतिहास का प्रथम
देषद्रोही आम्भी ने अपने वचन का पालन करते हुए आत्म समर्पण कर दिया। यहां से
सिकंदर ने पोरस को अपना निमंत्रण भेजा तो उसने (पोरस ने) ‘ सीमा पर रण स्थल में
मिलने का कथन गर्व के साथ कहा ’’। अतः सिकंदर ने KONOS को सिंध का पुल तोड़ कर झेलम पर
लगाने की आज्ञा दी। तथा फिलिप को तक्षशिला का क्षत्रप बना कर झेलम की ओर प्रस्थान
किया। मार्ग में सिकंदर ने पोरस के भतीजे ‘ स्पिटेसीज ’ को परास्त किया।
पोरस से युद्ध :- एरियन ने पोरस की सेना का भव्य वर्णन किया
है।युद्ध में पोरस का पुत्र मारा गया तथा आम्भी द्वारा पोरस के आत्मसमर्पण का
प्रयास व्यर्थ हो गया। अततः युद्ध स्थल में पोरस के विष्वास पात्र ‘‘ मेरूस ’’ के
माध्यम से पोरस ने आत्म समर्पण कर दिया। किन्तु पोरस की वीरता से प्रभावित सिकंदर
ने उसका राज्य वापस कर दिया। इतिहास में यह युद्ध ‘‘ हाइडेस्पस (झेलम या वितस्ता )
के युद्ध ’’ के नाम से दर्ज है।
ग्लोनिकादू से युद्ध :- इस गणराज्य को पराजित कर
पोरस के सुपुर्द कर दिया।
निकेनोर की हत्या :- ग्लौननिकाई क्षेत्र में
पर्षिया का क्षत्रप फ्रेटफर्नीज, थ्रोस की सेना के साथ सिकंदर से
मिला। यही पर शशिगुप्त ने आर्नो दुर्ग से संदेश भेजा कि ‘निकेनोर की हत्या कर दी
गई है।’ कहा जाता है कि चिनाब या चन्द्रभागा नदी (सिकंदर की भक्षक) पार करना
सिकंदर के लिए अषुभ था।
कठोई से युद्ध :- अपनी राजधानी संगल की रक्षार्थ कठ वींरों नें
सिकंदर के दांत खट्टे कर दिए। अंततः सिकंदर इसे पोरस की सहायता से ही जीत सका।
सौफाइटस (सौभूति) विजय :- भारत में सिकंदर की यह विजय
सेना के विद्रोह के पूर्व की अंतिम विजय रही।
सिकन्दर की सेना में विद्रोह :- सौभूति विजय प्राप्त करने के
बाद सिकन्दर व्यास नदी के तट पर पहुंचा तो सेना ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया।
सेना सिकंदर के लाख समझाने पर भी नहीं मानी। क्योंकि :
1. सैनिक निरन्तर युद्धों से परेशान
थे।
2. सैनिकों को अपने परिवार वालों की
याद आ रही थी।
3. भारतीय जलवायु की प्रतिकूलता।
4. भगल द्वारा नन्द सेना के विवरण
से सैनिकों का मनोबल टूट गया।
सिकन्दर की वापसी :- 325 ई0पू0 को सिकन्दर ने वापसी हेतु
प्रस्थान किया। उसने अपनी सेना के दो भाग कर दिए। पहला भाग ‘‘ निआर्कस ’’ के
नेतृत्व में जल मार्ग (अरब सागर) तथा दूसरा भाग सिकन्दर के नेतृत्व में थल मार्ग
से वापस हुआ। सेना का विभाजन ‘‘ पट्टल नगर ’’ में किया गया था। वापसी के पूर्व सिकन्दर
ने अपनी विजय सीमा निर्धारित करने रावी नदी के तट पर 12 विशाल स्तम्भ निर्मित किए। तथा
झेलम एवं व्यास नदियों के बीच का प्रदेश पोरस एवं कश्मीर तथा उरशा (अर्सेकिज) का
प्रदेश अभिसार राजा को सौंप दिया।
वापसी में पट्टल पहुंचने से पूर्व यूनानियों को अनेक
जातियों से युद्ध करना पड़ा। इन जातियों में प्रमुख निम्न लिखित थीं :-
अलगस्सोई (अग्रश्रेणी) :- शिवि जाति द्वारा सर्मपण के
बाद अग्रश्रेणी जाति ने लड़ते हुए यवन सेना को काफी हानि पहुंचाई।
मालव (क्षुद्रक) :- झेलम तथा चिनाव के संगम पर मल्लोई (मालव) तथा
ऑक्सीड्रकेसी (क्षुद्रक) नामक गण राज्यों से जूझना पड़ा। यहाँ के ब्राम्हणों ने भी
प्रतिरोध में अस्त्र उठाए। एक अन्य जाति अग्गलस्सोई (अर्जुनायन ?) ने भी कड़ा प्रतिरोध किया किन्तु
असफल होने पर अपने बच्चों तथा स्त्रियों के सहित आग में कूद कर जौहर कर लिया। यह
जौहर भारतीय इतिहास का प्रथम उल्लेखनीय जौहर है।
ब्राम्हण :- जब मूसेकेनोष (मूषिक) तथा ऑक्सीकेनोज के राजाओं ने
सिकन्दर की अधीनता स्वीकार कर ली तो ब्राम्हणों ने उन्हें देशद्रोही कहते हुए जनता
को धर्म के नाम पर विदेशी से लड़ने को ललकारा। अन्ततः सिकन्दर विजयी रहा।
तदुपरान्त सितम्बर 325 ई0पू0 को यवन सेना ‘‘ पट्टल ’’
पहुँची। सिकन्दर ने गृह यात्रा मकरान होते हुए पूर्ण की।
सिकन्दर की मृत्यु :- ई0पू0
325
को बेबीलोन में 32 वर्ष की अवस्था में । कुछ
मतानुसार 323 ई0पू0 को मृत्यु हुई।
सिकन्दर के आक्रमण के भारत पर प्रभाव :-
इतिहास की तिथि निर्धारण में सफलता।
सिकन्दर ने भारत में दो नगर स्थापित किए। 1. निकैया 2. बुकेफैला
भारतीय राज्यों को पांच भागों में विभाजित किया जो कि
शीघ्र ही नष्ट हो गए।
दीनार का प्रारम्भ जो यूनानी ‘ उलूक मुद्रा शैली द्रम
या द्रक्ष से प्रभावित थी।
ज्योतिष में होड़ा शास्त्र की अवधारणा का उदय।
पाइथागोरस के प्रमेय पर भारतीय प्रभाव।
अन्य महत्तवपूर्ण तथ्य :-
सिकन्दर , अरस्तु का शिष्य था।
सिकन्दर द्वारा स्थापित नगर Alexandria
of the Arachosians वर्तमान में ‘‘ कन्धार ’’ के नाम से प्रसिद्ध है।
निकैया (विजयनगर) तथा बऊकेफैला (प्रिय अश्व का नाम) की
स्थापना पोरस के सर्मपण के उपरान्त की।
निकैआ नगर की स्थापना ‘‘ रणक्षेत्र’’ में ही की।
पोरस का भतीजा ‘‘ गान्दरिस ’’ राज्य का शासक था।
सिकन्दर के विजय अभियान की अंतिम विजय पाटल विजय थी।
सिकन्दर भारत में लगभग उन्नीस माह रहा।
सिकन्दर के अेतिम सेनापति ‘‘ यूथइडेमस ’’ ने
पष्चिमोत्तर को 317 ई0पू0 में छोड़ा।
बैक्ट्रिया में यूनानी बस्तियों का जन्म - एकेमेनिड
काल में (पांचवी सदी ई0पू0 में )
यूनानी सेल्युसिड राज्य की सीमा मगध को स्पर्श करती
थी।
भारतीय नदियां और उनके यूनानी नाम -
नदियाँ यूनानी नाम
झेलम Hydespes
चिनाव Alexandraphague
रावी Hydrotes
व्यास Hyphasis
--- ००० ---